कोरबा जिले के करुमौहा गांव में सरपंच के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को लेकर बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। 25 मार्च को प्रस्ताव पर मतदान होना था, लेकिन उससे पहले ही घटनाक्रम ने पूरी स्थिति को संदिग्ध बना दिया।
क्या हुआ पूरा मामला?
16 मार्च से पंच निर्मला मंझवार और उनके परिवार के “अपहरण” का आरोप लगा। परिजनों ने सीधे एसपी कार्यालय पहुंचकर सरपंच और उनके सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाए।
लेकिन 25 मार्च को जब वोटिंग का दिन आया, तो एक और पंच के लापता होने के कारण मतदान रद्द करना पड़ा।
फिर आया चौंकाने वाला मोड़
26 मार्च को निर्मला मंझवार अचानक गांव लौटीं और रजगामार चौकी में बयान दिया कि —“वह अपनी मर्जी से गई थीं, किसी ने अपहरण नहीं किया।
”उठ रहे बड़े सवाल
1. परिवार से संपर्क क्यों नहीं?
निर्मला मंझवार ने खुद कहा कि उन्होंने मोबाइल में खबर देखी कि उनके परिजन परेशान हैं और एसपी कार्यालय तक पहुंच गए हैं। फिर भी उन्होंने अपने परिवार से संपर्क क्यों नहीं किया?
2. वोटिंग के दिन गैरहाजिरी क्यों?
अगर वह अपनी मर्जी से गई थीं, तो उन्हें 25 मार्च की अहम वोटिंग की जानकारी भी थी। फिर वह उस दिन वापस क्यों नहीं लौटीं?
3. पुलिस की भूमिका पर सवालसूत्रों के मुताबिक रजगामार चौकी प्रभारी ने एसपी से वादा किया था कि 25 मार्च से पहले पंच को वापस लाया जाएगा।
लेकिन वापसी 26 मार्च को हुई —क्या पुलिस उन्हें लेकर आई या वह खुद लौटीं?
4. क्या यह साजिश है?
अविश्वास प्रस्ताव आमतौर पर बहुमत के आधार पर लाया जाता है।
ऐसे में क्या पंचों का “गायब होना” एक सोची-समझी रणनीति थी? या पूरे मामले में किसी को गुमराह किया जा रहा है?
करुमौहा का यह मामला अब सिर्फ एक पंचायत विवाद नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक चाल, प्रशासनिक भूमिका और सच्चाई के बीच उलझा बड़ा सवाल बन चुका है।
इसी बीच मामले ने एक और नया मोड़ ले लिया सरपंच कविता कांदे ने कलेक्टर को पत्र लिखते हुए पंच निर्मला बाई मंझवार की हस्ताक्षर को जाली बताया है, और अविश्वास प्रस्ताव की कार्रवाई को निरस्त करने की मांग की है। मतलब साफ जाहिर है, सरपंच के कहने पर ही पंच निर्मला बाई गायब थी।
इस पूरे मामले में अनुविभागीय अधिकारी के आदेश का भी अवहेलना हुआ और प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था भी भेजी गई थी प्रशासन द्वारा इतना खर्च किया गया था लेकिन सरपंच मौके से नदारत रहे और दो पंच भी।
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